“खुद ही को कर बुलंद इतना
के खुद खुद बन्दे से पूछे,
बता तेरी रज़ा क्या?”

आधुनिक समाज में, असीम दुविधाओं से ग्रस्त, अस्वीकृति से जूंझता, अभावों को झेलता, अनुशासन को खोजता मनुष्य! उससे अगर किसी दिन, किसी भी दिन। शाम के समय हारबर लाइन की खचाखच भरी ट्रेन यदि यह पूछा जाये कि “तुम्हारा सबसे चुनौतीपूर्ण दिन कौनसा कौनसा था?” तो वह कानों से हैडफ़ोन निकलकर सर्वप्रथम आपके गाल पर इस प्रकार तमाचा जड़ देगा के आप वहां जनसमुदाय के उस घेरे में गाल पर हाथ रखे खड़े रहेंगे, बिना टस से मस हुए।

साहस और विनम्रता बटोरकर यदि आप पुनः उससे पूछें, तो आपकी जिज्ञासा पर तरस खाकर वह निसंदेह आप से कहेगा कि “कदाचित आज ही मेरा सबसे चुनौतीपूर्ण दिन था”। और यह एक हीर जवाब है। चुनौतियों के मध्य स्थित मनुष्य के लिए यह तय कर पाना कि उसका सबसे चुनौतीपूर्ण दिन कौनसा था, ऐसा है जैसे समुद्र को देखकर यह अनुमान लगाना कि कौनसी मछली कितने पानी में है।

एक दृष्टि से यह भी सत्य ही है की प्रत्येक दिन हमारे लिए अधिक से अधिक चुनौतीपूर्ण होना चाहिए। सर्वधर्म समभाव का बढ़ता आभाव (racism) हर भारतीय की सबसे बड़ी चुनौती है। बढती आबादी का यह दैनिक युद्ध हमें इतना भारी पद रहा है की प्रतिदिन हजारों किसान इस संग्राम में शहीद हो रहे हैं। हमारी बिजली की खपत की गति स्वयं बिजली की गति से गतिमान हो गयी। सालाना खाई गयी रिश्वत का यदि हिसाब लगाया जाए तो इस बदहज़मी का अखिल आयुर्वेद में कहीं उपाय नहीं मिलेगा। बढती गर्मी, घटती वर्षा, बहता लहू, गिरते आदर्श, कटते वृक्ष, बढ़ते भाव, प्रदूषण, कैंसर, एड्स, स्वाइन-फ्लू …
इन सब के बीच खड़े किसी भी भारतीय को इस प्रश्न का यही उत्तर देना चाहिए – मतदान दिवस!

(यह निबन्ध मैंने 2009 की सर्दियों में लिखा था।)

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